धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं। धन्यवचन (1) Blessed are the poor in spirit- Beatitudes (1)

 Blessed are the poor in spirit


सीनिय पास्टर रेव. जेरॉक ली

धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। मत्ती 5:3-10 का अर्थ है कि मन के दीनो के लिए परमेश्वर के राज्य के लिए सताया जाना एक आशीष है।

धन्यवचन एक मार्गसूचक के रूप में कार्य करता है जिसके साथ हम 1 कुरिन्थियों अध्याय 13 में आत्मिक प्रेम और गलातियों अध्याय 5 में आत्मा के फल के साथ अपने विश्वास को जांच सकते हैं।

पवित्रता की जुताई करना और स्वर्ग में सबसे शानदार निवास स्थान, नए यरूशलेम में जाना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। परमेश्वर की आशीषें कभी भी किसी भी स्थिति में डगमगाती नहीं है। अगर हम धन्यवचनों को जोत लें, तो हमें किसी चीज की जरूरत नहीं होगी।

  1. वो, जो मन के दीन हैं।

मन के दीन होना अहंकार, घमंड, स्वार्थ या लोभ से मुक्त होना है। जो मन के दीन हैं वे आसानी से सुसमाचार को स्वीकार कर लेते हैं। यीशु मसीह को स्वीकार करने के बाद, वे आत्मिक चीजों की भी लालसा करते हैं, ताकि उन्हें आसानी से परमेश्वर की सामर्थ से बदला जा सके।

मत्ती 19 में, एक युवक ने यीशु से पूछा, हे गुरु, मैं कौन सा भला काम करूं कि अनन्त जीवन प्राप्त कर सकूं? यीशु ने उससे कहा कि वह अपनी संपत्ति गरीबों को देने के लिए बेच दे और फिर मेरे पीछे हो ले। युवक ने सोचा कि उसने आज्ञाओं का बहुत अच्छी तरह से पालन किया है, लेकिन वह कष्ट से लौट आया। उसके पास बहुत धन था, और उसके लिए धन उसके अनन्त जीवन से अधिक महत्वपूर्ण था।

यीशु ने उसे देखकर कहा, “सुई के नाके में से ऊँट का निकल जाना, किसी धनवान के परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से सरल है।” यहाँ एक अमीर आदमी का मतलब हृदय का अमीर होना है। वे बाहर से बुराई नहीं करते, लेकिन वे लालच से भरे होते हैं। वे धन, सामर्थ, ज्ञान, अभिमान या सांसारिक सुखों का आनंद लेते हैं। वे सुसमाचार को स्वीकार करने की आवश्यकता महसूस नहीं करते वो परमेश्वर की तलाश नहीं करते हैं।

लूका 16 में अमीर आदमी और गरीब आदमी लाजर का दृष्टांत हमें मन के दीन होने के महत्व के बारे में सिखाता है। बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि हमें बचाए जाने के लिए लाजर की तरह एक गरीब जीवन जीना होगा। यीशु ने हमें हमारे पापों से छुड़ाया और गरीबी का जीवन जिया ताकि हम एक समृद्ध जीवन जी सकें। यदि हम मन के दीन हैं और परमेश्वर के वचन के अनुसार जीयें (2 कुरि० 8रू9)।

  1. मन के दीन होना।

1) शरीर की अभिलाषा को निकाल फेकना ।

1 यूहन्ना 2ः15-16 कहता है तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है।

क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है।

शरीर की अभिलाषा मन में पाप करने की इच्छा है। यह हमें घृणा, क्रोध, लोभ, व्यभिचारी मन, ईष्र्या और अहंकार के पीछे चलने करने का कारण बनती है। यह आपको सोचने और पाप करने के लिए प्रेरित करता है।

जो दूसरों का न्याय करने की इच्छा रखते हैं वे अन्य लोगों के बारे में अफवाहें सुनना चाहते हैं। जब वे इस तरह की अफवाहें और गपशप फैलाते हैं तो उन्हें अच्छा लगता है। गुस्सा करने वालों को छोटी-छोटी बातों पर भी नखरे करने पर अच्छा लगता है।

हमें मन के दीन होने के लिए शरीर की अभिलाषा से छुटकारा पाना होगा। हम इसे आत्मा की परिपूर्णता के साथ जोषीली प्रार्थनाओं के द्वारा दूर कर सकते हैं।

2) आँखों की अभिलाषा को निकाल फेंकना।

जब हम कुछ ऐसा देखते या सुनते हैं जिससे हमारा हृदय उत्तेजित हो जाता है, तो हम उस कार्य को करने का प्रयास कर सकते हैं। ये है आँखों की अभिलाषा। जब आप कुछ देखते हैं, यदि आप इसे मजबूत भावनाओं के साथ याद करते हैं, तो आपको बाद में उसी भावना को याद करेंगे जब आप कुछ ऐसा ही देखेंगे। जब आप कुछ ऐसा ही सुनते हैं तो यह वही होता है यह आपकी आँखों की अभिलाषा को जन्म दे सकता है।

यदि हम आंखों की अभिलाषा को दूर नहीं करेंगें और वरन उसे पकड़े रहेंगे, तो यह शरीर की अभिलाषा को प्रेरित करेगी और हमें पाप करने के लिए प्रेरित करेगी। दाऊद ने एक बार आँखों की अभिलाषा के कारण पाप किया था, भले ही उसे परमेश्वर ने अपने हृदय के अनुसार मनुष्य के रूप में सराहा था।

आंखों की अभिलाषा उस फ्यूज के समान है जो शरीर की अभिलाषा में आग लगा देती है। इसलिए हमें इसे कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। आँखों की अभिलाषा को दूर करना अपनी इच्छा शक्ति से किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि जो कुछ भी असत्य है उसे न देखें, न सुनें या न सोचें। साथ ही हमें सत्य को अच्छी भावनाओं के साथ देखना, सुनना और सोचना चाहिए, ताकि हम आंखों की अभिलाषा को पूरी तरह से दूर कर सकें।

3) जीवन के घमण्ड को निकाल फेकना।

जीवन का घमण्ड संसार के सभी सुखों का आनंद लेते हुए स्वयं को प्रकट करने का प्रयास करना है। वे खुद को ऊपर उठाने के लिए धन, सम्मान, ज्ञान, प्रतिभा, दिखावे आदि के बारे में डींग मारते हैं। ऐसा कार्य व्यर्थ है (याकूब 4:16)।

परमेश्वर की सन्तान को केवल परमेश्वर की महिमा करने के लिये प्रभु में घमण्ड करना चाहिये (1 कुरि० 1:31)। प्रभु में घमण्ड करना परमेश्वर के उस अनुग्रह और आशीष पर घमण्ड करना है जो उन्होंने प्राप्त किया और स्वर्ग के राज्य के बारे में घमंड करना और उसकी गवाही देना है। इसलिए, वे परमेश्वर की महिमा करते हैं और अन्य लोगों में विश्वास और आशा बोते हैं। यह दूसरों को आशा और उत्साह देता है।

हालाँकि, ऐसे लोग भी हैं जो प्रभु में घमण्ड करने का नाटक करते हुए स्वयं पर घमण्ड करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार, हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि हम जीवन के घमण्ड को हम पर हावी न होने दें (रोमियों 15:2)।

4) एक आत्मिक बालक बनें।

मत्ती 18 में, यीशु ने कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे। बच्चे सरल और षुद्ध होते है, इसलिए उन्हे जो कुछ भी सिखाया जाता है उसे स्वीकार करते हैं। इसी तरह, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं जब हम विश्वास करते हैं और परमेश्वर के वचन का पालन करते हैं जो हम सीखते हैं। आात्मिक बालक के दृष्टिकोण वाले लोग आसानी से अपनी गलतियों पर खेदित होंगे और पश्चाताप करेंगे। वे परमेश्वर के वचन से जीने की कोशिश करते हैं।

हालांकि, अगर हम उस निष्कपटता को खो देते हैं, तो हम पाप करने के लिए सुन्न हो जाएंगे। हम दूसरों का न्याय करेंगें, ईष्यालु हो जाते, दूसरों की गलतियां फैलाते, और छोटे-बड़े झूठ बोलते। और फिर भी, हमें एहसास नहीं होगा कि हम बुराई कर रहे हैं। हम अपना लाभ प्राप्त करने के लिए प्राप्त अनुग्रह को त्याग देंगे और फिर भी हमारे पास विवेक की कोई पीड़ा नहीं है।

आत्मिक बालक भलाई और बुराई के प्रति संवेदनशील होते हैं। ऐसी चीजें हो सकती हैं जिन्हें अविश्वासी बुराई नहीं मानते, लेकिन अगर परमेश्वर का वचन कहता है कि यह बुरा है, तो वे अपने हृदय से उससे नफरत करते हैं। वे ऐसा नही करने का भी प्रयास करते हैं। वे अपने अभिमान पर जोर नहीं देते हैं या खुद को ऊपर उठाने की कोशिश नहीं करते हैं। जब वे परमेश्वर का वचन सुनते हैं तो वे अपने विचारों पर जोर नहीं देते। यहां तक कि अगर वे परमेश्वर के वचन के कुछ हिस्सों को नहीं समझते हैं, तो भी वे न्याय नहीं करते हैं बल्कि उस पर विश्वास करने और उसका पालन करने का प्रयास करते हैं।

कुछ लोग आत्मिक वयस्क बन जाते हैं क्योंकि वे केवल परमेश्वर के वचन का ज्ञान इकट्ठा कर लेते हैं। वे उन पापों के प्रति असंवेदनशील हैं जिन्हें वे महसूस करते हैं। जब वे संदेश सुनते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे इसे पहले से ही जानते हैं। या, वे केवल वही मानते हैं जो उनके लिए फायदेमंद है। वे परमेश्वर के वचन से दूसरों का न्याय करते हैं। इसलिए मन के दीन होने के लिए हमें आत्मिक बालक के समान होना चाहिए जो नम्र हों। हमें अपने हृदय में बुराई और पापों का एहसास करना चाहिए और उन्हें जोषीली प्रार्थनाओं के माध्यम से दूर करना चाहिए।

  1. मन के दीन वालों के लिए आषीषें।

मत्ती 5:3 कहता है, धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। जैसा कि कहा गया है, वे स्वर्ग के राज्य के वारिस होंगे जिसे इस पृथ्वी के किसी भी सम्मान या धन से बदला नहीं जा सकता।

स्वर्ग वह स्थान है जहाँ परमेश्वर की संतान रहेंगी। यह एक सुंदर आत्मिक संसार है जिसकी तुलना इस संसार से नहीं की जा सकती। जिस तरह माता-पिता नए जन्मे बच्चे के लिए चीजें पहले से तैयार करते हैं, परमेश्वर स्वर्ग के राज्य को अपनी संतानों को देने के लिए तैयार कर रहा है जिन्होंने मन के दीन होने के सुसमाचार को स्वीकार कर लिया है।

यीशु ने यूहन्ना 14ः2 में कहा, मेरे पिता के घर में बहुत से निवास स्थान हैं। स्वर्ग के राज्य में कई स्थान हैं, इसलिए प्रत्येक का निवास स्थान इस बात पर निर्भर करेगा कि वे किस हद तक परमेश्वर से प्रेम करते थे और उसके वचन के अनुसार जीते थे।

यदि हम केवल सुसमाचार सुनते हैं और यीशु मसीह को हमारे उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं, तो हम स्वर्ग में प्रवेश करेंगे (लूका 23:43)। हालाँकि, जब हम परमेश्वर के वचन के अनुसार जीने के द्वारा सत्य द्वारा बदल जाते हैं, तो हम पहले राज्य, दूसरे राज्य, या स्वर्ग के तीसरे राज्य में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। इसके अलावा, यदि हम हृदय में पवित्रता को जोत लेते हैं और परमेश्वर के सभी घराने में विश्वासयोग्य रहते हैं, तो हम स्वर्ग में सबसे सुंदर निवास स्थान, नए यरूशलेम के शहर में अनन्त आशीषों का आनंद लेने में सक्षम होंगे (व्यवस्थाविवरण 10:14 प्रकाषितवाक्य 21: 2)।

अगर हम मन के दीन हो जाते हैं, तो हम परमेश्वर से मिल सकते हैं और उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा, हम इस पृथ्वी पर परमेश्वर की संतान होने के अधिकार और आशीषों का आनंद ले सकते हैं।

प्रिय भाइयों और बहनों, एक बार जब हमने धन्यवचन की पहली आशीष प्राप्त कर ली है, तो मुझे आशा है कि आप एक आत्मिक बालक के रूप में और अधिक उत्साह के साथ परमेश्वर से प्रेम करते रहेंगे और उन लोगों को सुसमाचार फैलाएंगे जो मन के दीन हैं। ऐसा करने में, आप सभी धन्यवचनों को पूरी तरह से प्राप्त कर सकते हैं, मैं प्रभु के नाम से यह प्रार्थना करता हूं।

धन्यवचन 4 को पढ़ने के लिए यहां –  क्लिक करे

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